प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को भारत की विदेश नीति में बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बढ़ती नजदीकी ने दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दी है। भारत ने इजरायल को लेकर 75 साल की झिझक से आगे बढ़ते हुए अब अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रिश्तों को मजबूत करना शुरू किया है।
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स्वपन दास गुप्ता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे और वहां प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनकी करीबी ने भारत की विदेश नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पीएम मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति पर विपक्ष और कुछ रणनीतिक विश्लेषकों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं, लेकिन यह भारत की लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है।
हालांकि, इजरायल की उनकी संक्षिप्त यात्रा और भारत की विदेश नीति पर इसके कथित प्रभाव को लेकर जो आक्रोश था, वह राजनीतिक रिएक्टर स्केल को खतरे के निशान को भी पार कर गया। हमेशा की तरह, कुछ लोगों ने उम्मीद के मुताबिक हद से ज्यादा विरोध किया।
सियासी घमासान
- सामान्य राजनीतिक आलोचना के अलावा इस मुद्दे पर पूर्व व्यवस्था से जुड़े एक वरिष्ठ नेता द्वारा अपने नाम से लेख लिखना भी असामान्य रहा। इसे मोदी द्वारा विदेश नीति में एक नया सामान्य बनाने की कोशिश को लेकर बढ़ती बेचैनी का संकेत माना गया।
- अगर ईरान के सर्वोच्च नेता की कथित शहादत को लेकर 40 दिन के शोक काल में विरोध प्रदर्शन तेज होते हैं, तो भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं। भारत में विपक्ष के नेता को उनकी पहचान बन चुकी सफेद टी-शर्ट के साथ फिलिस्तीनी संकेत के साथ देखा जा सकता है।
पीएम मोदी की डिप्लोमेसी
- इजरायल यात्रा के दौरान मोदी ने वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को और मजबूत किया। नेतन्याहू को इजरायल के 77 साल के इतिहास में सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत और इजरायल के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग और राजनीतिक निकटता का भी संकेत मानी गई।
- क्नेस्सेट में मोदी के भाषण के दौरान इजरायल की राजनीति में दुर्लभ द्विदलीय समर्थन देखने को मिला। 7 अक्टूबर के आतंकी हमलों के पीड़ितों के प्रति भारत की स्पष्ट एकजुटता को इस बात के प्रमाण के रूप में देखा गया कि नई दिल्ली का रुख पहले की तुलना में बदला हुआ है।
- हालांकि भारत की विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। खाड़ी देशों में भारत के बड़े आर्थिक हित हैं और वहां के साथ उसका लंबे समय से व्यापारिक संबंध है। इसलिए इजरायल के साथ बढ़ती निकटता का अर्थ यह नहीं है कि भारत किसी एक पक्ष का समर्थन करते हुए किसी युद्ध में शामिल होगा या जियोनिस्ट विचारधारा का अनुसरण करेगा।
भारत का रुख स्पष्ट
- भारत ने यूक्रेन युद्ध के दौरान भी यूरोपीय देशों के दबाव के बावजूद रूस से दूरी नहीं बनाई। इस संतुलित रुख के बावजूद भारत और यूरोपीय संघ के संबंधों पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा। इससे यह संकेत मिलता है कि आज का भारत न तो किसी के दबाव में आता है और न ही उसे नजरअंदाज किया जा सकता है।
भारत-इजरायल का इतिहास
- इजरायल यात्रा के महत्व को समझने के लिए इतिहास की ओर देखना जरूरी है। 1947 में जब संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के विभाजन और इजरायल के गठन की योजना पेश की गई थी, तब यह उम्मीद थी कि भारत इसका समर्थन करेगा। यह उम्मीद इसलिए थी क्योंकि भारत में यहूदियों के खिलाफ कभी भी संगठित विरोध या यहूदी-विरोधी भावना नहीं रही थी।
- उस समय यहूदियों की ओर से समर्थन जुटाने के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन सहित कई लोगों ने भारत सरकार से संपर्क किया था। आइंस्टीन और जवाहरलाल नेहरू के बीच हुई चिट्ठियों से पता चलता है कि इजरायल को मान्यता देने की अपील नैतिक आधार पर की गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जवाब में कहा था कि भारत में यहूदी समुदाय के कष्टों के प्रति गहरी सहानुभूति है, लेकिन राष्ट्रीय नीतियां अक्सर राष्ट्रीय हितों से तय होती हैं और हर देश अपने हितों को प्राथमिकता देता है।